तफ़सीर अल-मुख़्तसर
لَهُۥ دَعْوَةُ ٱلْحَقِّ ۖ وَٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ لَا يَسْتَجِيبُونَ لَهُم بِشَىْءٍ إِلَّا كَبَـٰسِطِ كَفَّيْهِ إِلَى ٱلْمَآءِ لِيَبْلُغَ فَاهُ وَمَا هُوَ بِبَـٰلِغِهِۦ ۚ وَمَا دُعَآءُ ٱلْكَـٰفِرِينَ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍ ﴿١٤﴾
केवल अल्लाह ही के लिए तौह़ीद (एकेश्वरवाद) की पुकार है, जिसमें उसका कोई साझी नहीं है। और जिन मूर्तियों को मुश्रिक लोग अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी भी मामले में उन्हें पुकारने वाले की पुकार का जवाब नहीं देतीं। उनका उन मूर्तियों को पुकारना एक प्यासे की तरह है, जो पानी की ओर अपना हाथ फैलाता है, ताकि वह उसके मुँह तक पहुँच जाए और वह उसे पी ले। हालाँकि पानी उसके मुँह तक कभी भी पहुँचने वाला नहीं। दरअसल काफ़िरों का अपनी मूर्तियों को पुकारना व्यर्थ है और सही से दूर है। क्योंकि वे उन्हें न कोई लाभ पहुँचा सकती हैं और न कोई हानि दूर कर सकती हैं।