तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَءَاتِ ذَا ٱلْقُرْبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلْمِسْكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا ﴿٢٦﴾
(ऐ ईमान वाले) रिश्तेदार को उसकी रिश्तेदारी का हक़ दे। तथा ज़रूरतमंद निर्धन को दे और ऐसे ही उस यात्री को दे, जो अपनी यात्रा में फँस गया है। और अपना धन पाप में, या फालतू में खर्च न कर।