तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَٱصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِٱلْغَدَوٰةِ وَٱلْعَشِىِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُۥ ۖ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْ تُرِيدُ زِينَةَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَا تُطِعْ مَنْ أَغْفَلْنَا قَلْبَهُۥ عَن ذِكْرِنَا وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ وَكَانَ أَمْرُهُۥ فُرُطًا ﴿٢٨﴾
आप अपने आपको उन लोगों के संग रखें, जो निष्ठापूर्वक अपने पालनहार को दिन की शुरुआत और उसके अंत में, इबादत के तौर पर और कुछ माँगने के लिए, पुकारते हैं। तथा आप धन और सम्मान वाले लोगों के साथ बैठने की इच्छा में उनसे अपनी आँखें न फेरें। और आप उसकी बात न मानें, जिसके दिल पर मुहर लगाकर हमने उसे हमारी याद से असावधान कर दिया है। जिसके कारण उसने आपको अपनी बैठक से गरीबों को हटाने का आदेश दिया, और उसने अपने पालनहार की आज्ञाकारिता पर अपनी इच्छा के अनुपालन को प्रधानता दी और उसके सभी कार्य व्यर्थ और बर्बाद हैं।