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البقرةआयत 75

तफ़सीर अल-मुख़्तसर

أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا۟ لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿٧٥﴾

तो क्या - ऐ मोमिनो! - तुम यहूदियों की स्थिति की वास्तविकता और उनके हठ को जानने के बाद इस बात की आशा रखते हो कि वे ईमान ले आएँगे और तुम्हारी बात स्वीकार कर लेंगे?! जबकि उनके विद्वानों का एक समूह ऐसा रहा है, जो तौरात में उनपर उतरे हुए अल्लाह के वचनों को सुनते हैं; फिर वे उन्हें समझने और जानने के बाद उनके शब्दों और अर्थों को बदल देते हैं, जबकि वे अपने अपराध की गंभीरता को जानते हैं।