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آل عمرانआयत 61

तफ़सीर अल-मुख़्तसर

فَمَنْ حَآجَّكَ فِيهِ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا۟ نَدْعُ أَبْنَآءَنَا وَأَبْنَآءَكُمْ وَنِسَآءَنَا وَنِسَآءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ ٱللَّهِ عَلَى ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿٦١﴾

(ऐ रसूल!) आपसे नजरान के ईसाइयों में से जो भी ईसा अलैहिस्सलाम के मामले में बहस करे, यह दावा करते हुए कि वह अल्लाह के बंदे नहीं हैं, इसके पश्चात कि उनके बारे में आपके पास सही ज्ञान आ चुका; तो उनसे कह दें : आओ, हम अपने पुत्रों और तुम्हारे पुत्रों, अपनी स्त्रियों और तुम्हारी स्त्रियों को बुला लें और अपने आपको और तुम्हें भी, और हम सब इकट्ठे हो जाएँ, और फिर अल्लाह से गिड़गिड़ाकर विनती करें कि वह हमारे और तुम्हारे बीच झूठ बोलने वालों पर अपना श्राप (ला'नत) भेजे।