तफ़सीर अल-मुख़्तसर
تُرْجِى مَن تَشَآءُ مِنْهُنَّ وَتُـْٔوِىٓ إِلَيْكَ مَن تَشَآءُ ۖ وَمَنِ ٱبْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَن تَقَرَّ أَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَآ ءَاتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِى قُلُوبِكُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَلِيمًا ﴿٥١﴾
(ऐ रसूल!) आप अपनी पत्नियों में से जिसकी बारी विलंबित करना चाहें, विलंबित कर दें और उसके साथ रात न गुजारें। तथा उनमे से जिसे चाहें, अपने पास रखें और उसके साथ रात बिताएँ। और जिनकी बारी को आपने विलंबित कर दिया है, उनमें से किसी को (फिर से) अपने साथ रखना चाहें, तो इसमें आपपर कोई गुनाह नहीं है। आपके लिए यह विकल्प और विस्तार इस बात के अधिक निकट है कि इससे आपकी स्त्रियों की आँखें ठंडी रहें और यह कि आपने उन्हें जो कुछ दिया है, उससे वे संतुष्ट रहें। क्योंकि उन्हें मालूम है कि आपने कोई कर्तव्य नहीं छोड़ा है और न किसी हक़ की अदायगी में कंजूसी की है। और (ऐ पुरुषो!) तुम्हारे दिलों में जो कुछ स्त्रियों को छोड़कर कुछ की ओर झुकाव पाया जाता है, अल्लाह उससे अवगत है। अल्लाह अपने बंदों के कार्यों को भली-भाँति जानने वाला है, उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं है, तथा वह सहनशील है, उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता, ताकि वे तौबा कर लें।