तफ़सीर अल-मुख़्तसर
أَن تَقُولَ نَفْسٌ يَـٰحَسْرَتَىٰ عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِى جَنۢبِ ٱللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ ٱلسَّـٰخِرِينَ ﴿٥٦﴾
यह काम करते रहो। डर है कि क़ियामत के दिन कोई व्यक्ति मारे अफ़सोस के यह न कहे कि अफ़सोस है उस कोताही पर, जो मैंने कुफ़्र और गुनाह पर क़ायम रहकर अल्लाह के हक़ में की है और ईमान वालों तथा आज्ञाकारियों का मज़ाक उड़ाया है।