तफ़सीर अल-मुख़्तसर
لَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنَـٰهُ حُطَـٰمًا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ ﴿٦٥﴾
यदि हम उस खेती को चूर-चूर करना चाहें, तो उसके पकने और काटे जाने के निकट होने के बाद, अवश्य उसे चूर-चूर कर दें। फिर उसके बाद तुम उसे पहुँचने वाली आपदा पर आश्चर्य करते रह जाओ।