तफ़सीर अल-मुख़्तसर
قُلْ هَلُمَّ شُهَدَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ يَشْهَدُونَ أَنَّ ٱللَّهَ حَرَّمَ هَـٰذَا ۖ فَإِن شَهِدُوا۟ فَلَا تَشْهَدْ مَعَهُمْ ۚ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَآءَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ وَهُم بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ ﴿١٥٠﴾
(ऐ रसूल!) इन मुश्रिकों से, जो अल्लाह के हलाल किए हुए को हराम करते हैं और दावा करते हैं कि अल्लाह ही ने इसे हराम किया है, कह दें : तुम अपने गवाहों को प्रस्तुत करो, जो यह गवाही दें कि अल्लाह ने इन वस्तुओं को हराम किया है, जिन्हें तुमने हराम ठहरा लिया है। यदि वे बिना ज्ञान के गवाही दें कि अल्लाह ने उन्हें हराम किया है, तो (ऐ रसूल!) आप उनकी गवाही में उनको सच्चा न मानें; क्योंकि यह झूठी गवाही है। तथा आप उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें, जो अपनी इच्छाओं को ही निर्णायक मानते हैं। क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया है जब उन्होंने उस चीज़ को हराम ठहरा दिया जिसे अल्लाह ने उनके लिए हलाल किया था। तथा आप उनका अनुसरण न करें, जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और वे अपने रब के साथ साझी बनाते हैं। चुनाँचे उसके अलावा को उसके बराबर (समकक्ष) ठहराते हैं। और जिसका अपने पालनहार के साथ यह रवैया हो उसका अनुसरण कैसे किया जा सकता है?!