तफ़सीर अल-मुख़्तसर
فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿٥﴾
फिर जब सम्मानित महीने बीत जाएँ, जिनमें तुमने अपने दुश्मनों को सुरक्षा प्रदान किया है, तो बहुदेववादियों (मुश्रिकों) को जहाँ कहीं भी पाओ, उन्हें क़त्ल करो, उन्हें पकड़ लो, उन्हें उनके गढ़ों में घेर लो और उनके रास्तों में उनकी घात में रहो। फिर यदि वे अल्लाह के समक्ष शिर्क से तौबा कर लें, नमाज़ स्थापित करें तथा ज़कात अदा करें, तो वे तुम्हारे इस्लामी भाई हो गए। इसलिए उनसे युद्ध करना छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदे को बहुत क्षमा करने वाला, उसपर अति दयावान् है।